आतंकिस्तान : धोये क्या निचोये क्या ...?

भारतीय विदेशी मुद्रा भण्डार नवीनतम प्रकाशित आंकड़ों के आधार पर 400.72 अरब USD हो गया . यह समाचार भारतीयों के लिए एक सुखद एवं उत्साहित करने वाली खबर है. 

         सरकारी मुद्दों पे संवेदित खबरिया चैनल का एक विश्लेषण देखिये  NDTV ने अपनी खबर में भारतीय विदेशी मुद्रा भण्डार के मामले में अपनी छोटी किन्तु असरदार रिपोर्ट में स्वीकारा है कि भारत में अप्रत्याशित ढंग से विदेशी मुद्रा भण्डार में इजाफा हुआ है. सितम्बर 2017 में हुई समीक्षा के हवाले से प्रकाशित समाचार के अनुसार :-   

रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार विदेशी मुद्रा भंडार में इस बढ़ोतरी की प्रमुख वजह विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों (एफसीए) का बढ़ना है. समीक्षा अधीन सप्ताह में यह 2.56 अरब डॉलर बढ़कर 376.20 अरब डॉलर हो गईं. देश का स्वर्ण भंडार इसी अवधि में बिना किसी बदलाव के 20.69 अरब डॉलर पर अपरिवर्तित रहा.

भारत का विदेशी ऋण 13.1 अरब डॉलर यानी 2.7% घटकर 471.9 अरब डॉलर रह गया है. यह आंकड़ा मार्च, 2017 तक का है. इसके पीछे प्रमुख वजह प्रवासी भारतीय जमा और वाणिज्यिक कर्ज उठाव में गिरावट आना है.

आर्थिक मामलों के विभाग की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015-16 के मुकाबले 2016-17 में हालत बेहतर हुए हैं और ऋण प्रबंधन सीमाओं के तहत बना हुआ है.

मार्च, 2017 की समाप्ति पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) और विदेशी ऋण का अनुपात घटकर 20.2% रह गया हैजो मार्च 2016 की समाप्ति पर 23.5% था.

 

मार्च, 2017 की समाप्ति पर लॉन्ग टर्म विदेशी कर्ज 383.9 अरब डॉलर रहा है जो पिछले साल के मुकाबले 4.4% कम है. समीक्षावधि में कुल विदेशी ऋण का 81.4% लॉन्ग टर्म विदेशी ऋण है.

उपरोक्त समाचार के साथ साथ जब हमने दक्षिण एशिया के अन्य प्रमुख देशों पाकिस्तान और बंगला देश की आर्थिक स्थिति की पता साजी की तो ज्ञात हुआ कि दक्षिण एशिया में पाकिस्तान एक फिसड्डी देश है बेशक बंगला देश से भी पीछे . भारत के खजाने में 400.72 अरब डालर , बांगला देश में 33 अरब  डालर , तो आतंकिस्तान में कुल 20 अरब डालर शेष है. 

पाकिस्तान को 1 डालर के मुकाबले 105.462  पाकिस्तानी रूपए खर्च करने होते हैं . जबकि भारत में एक डालर 64.80 बांगला देश में 1 USD के लिए 81.93 टके खर्च करने होते हैं . 

उसका विदेशी मुद्रा भण्डार इसी तरह कम होता रहेगा तो पाकिस्तान के पास केवल तीन विकल्प शेष  हैं 

  एक - अपने रूपए का अवमूल्यन करे 

  दो   - विश्व मुद्रा कोष सहायता ले.

         तीन   -  चीन से मदद में तेज़ी आए

सबसे पहले तीसरे बिंदु का खुलासा करना ज़रूरी है कि चीन से उसे मदद मिलती रहेगी. किन्तु चीन की मदद एक ऐसे ब्याजखोर साहूकार की होती है जो भविष्य में सर्वाधिक शोषण करता है. ऐसी स्थिति की जिम्मेवारी पाकिस्तानी सैन्य डेमोक्रेटिक सिस्टम की है. साथ ही आप समझ पा रहे होंगे कि पाकिस्तान अब बेहद नाज़ुक दौर से गुज़र रहा है. 

मौद्रिक अवमूल्यन तब सफल साबित  होता है जबकि देश में विकास  की धारा बहाने के वैकल्पिक रास्ते मौजूद हों . पाकिस्तान में ऐसा नहीं है वहां मानवता कराहती है जिसकी चीखें विश्व को सुनाई नहीं दे रहीं चिकित्सा ,शिक्षाऔर आतंरिक सुरक्षा एवं भयमुक्त समाज निर्माण  के मामलों में पाकिस्तानी फैडरल एवं राज्यों की  सरकारें  असहाय एवं सफल हैं.  

विकास गतिविधियों में फिसड्डी आतंकिस्तान को सितम्बर 2017 यूएन की 72 वीं सालाना बैठक में विश्वसमुदाय के सामने बेहद अपमानजनक परिस्थियों का सामना तक करना पड़ा है. किसी भी राष्ट्र के प्रबंधन कर्ताओं का धर्म लोकसेवा है न कि आत्मकेंद्रित होकर स्वयं का भला करना . पाकिस्तानी मीडिया अब तो खुल के आरोप लगाने लगा है कि – “पाकिस्तान के नेता अपने बच्चों को पाकिस्तान में रहने नहीं देते क्योंकि न तो वे पाकिस्तान को उनकी पौध के काबिल समझते और न ही खुदके रहने लायक समझतें हैं”

इसी सितम्बर 2017 यूएन की 72 वीं सालाना भारत ने  खुले तौर पर एक दिन पाकिस्तान को आतंकिस्तान का दर्ज़ा दिया दूसरे दिन वजीर-ए-खारजा श्रीमती सुषमा स्वराज ने बता दिया कि हम विकास के पैरोकार हैं जबकि पाकिस्तान आतंक का न केवल पैरोकार है बल्कि वो विश्व के लिए भी खतरा बन गया है.

 आइये एक नज़र इन दौनों देशों की आर्थिक स्थिति पर एक नज़र डालतें हैं

  1. विकासदर :- भारत – 7.57 पाकिस्तान :- 4.71
  2. प्रति नागरिक आय :- भारत – 5,350 पाकिस्तान :- 4,840
  3. बेरोजगारी :-  भारत – 3.6 , पाकिस्तान – 5.2

     ये आंकड़े इस बात का सबूत हैं कि भारत किस प्रकार एक बड़ी जनसंख्या को प्रबंधित करते हुए विकास पथ पर अग्रसरित है जबकि पाकिस्तान 13 वीं बार अन्तराष्ट्रीय मुद्राकोष की शरण में जाने की दिशा में है . हालांकि भारतीय प्रतिव्यक्ति आय पाकिस्तान के सापेक्ष बहुत उत्साहित करने योग्य नहीं है तथापि यहाँ आप जान लीजिये कि भारत का अर्थतंत्र तेज़ी से पर कैपिटा इनकम को अगले तीन सालों में बहुत आगे ले जा सकता है और इसे चीन के सापेक्ष 13 से 14 हज़ार डालर तक आसानी से ले जावेगा . याद रखना होगा कि यह तथ्य भारतीय युवा जनसंख्या की कर्मठता , आतंरिक एवं सीमाओं पर शान्ति एवं विदेशी निवेश से होगा. इस विकास-प्रवाह को बनाए रखने के लिए समूचे राष्ट्र को बिना आपसी (सियासी, धार्मिक, क्षेत्रीयतावादी, जातिवादी ) संघर्ष के केवल राष्ट्र हित में सोचते और करते रहना होगा . अगर अगले तीन साल में हम चीन से आगे निकल गए तो कोई भी ताकत भारत के पासंग  अगले कम से कम  500 साल तक न बैठ सकेंगीं .

इसी के सापेक्ष पाकिस्तान तेज़ी नीचे जा सकता है क्योंकि उसके पास सामाजिक  आर्थिक विश्लेषण के लिए समय नहीं है बल्कि अगर समय  है भी तो सियासी-इच्छा शक्ति आर्मी डामिनेटेड फैडरल प्रबंधन के कारण कश्मीर बलूच सिंध जैसी समस्याओं के साथ साथ आतंरिक आतंकवाद से जूझने पर खर्च करतें हैं .

ऐसा नहीं है कि वहां {पाकिस्तान में } मेरे जैसी उम्र वाले विचारक न होंगे कर्मठ युवा न होंगें परन्तु उस तिलिस्मी देश के  अभागे नागरिकों को धर्मान्धता , भारत के खिलाफ उकसाने और झूठा इतिहास बताने का धीमा ज़हर  बाकायदा दिया जाता है. और भारतीय मुसलमान भारतीय अर्थतंत्र में एक बड़ी भूमिका का निर्वाह हुए अर्थतंत्र को मज़बूती देते नज़र आते हैं .

एक छोटे से नगर जबलपुर का उदाहरण लें तो आप साफ़ समझ जाएंगे कि भरतीपुर जैसी जगह में मस्जिद, गुरुद्वारा , चर्च, और मंदिर में सबकी आस्थाएं परवान चढ़ रहीं होतीं हैं सभी एक दूसरे के साथ भारतीय बन के रहतें हैं. न कि हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई बनकर ..!

उसके पीछे आत्मीय संबंधो का सिंक्रोनैज़ेशन है. जबकि पाकिस्तान में ऐसा नहीं है. वहां तो आतंक की जड़ें बेहद गहरीं हैं . ये सभी लोग जानतें हैं. हाफ़िज़ सईंद इसका सर्वोच्च उदाहरण हैं .

कहाँ गया होगा  पाकिस्तान को मिला विदेशी पैसा ..?

ऐसी स्थिति में पाकिस्तान अनिवार्यरूप से मुद्राकोष से वित्तीय मदद अवश्य लेगा. और  IMFA से मिलने वाले संभावित धन से भी कोई लाभ मुझे तो नज़र नहीं आता . आपको याद होगा कि 1980 में पाकिस्तान ने 12वीं बार IMFA से वित्तीय मदद ली  थी , और भारत को वर्ष 1991 में सहायता मिली थी. पाकिस्तान  70 सालों में चीनी इमदाद से इतर 13वीं बार एक बार फिर कटोरा लिए खडा है. 12 बार अमेरीकी इमदाद के साथ संभावित रूप से बड़ा  क़र्ज़ लेने वाले पाकिस्तान ने प्राप्त धन का उपयोग न तो विकास में किया न ही जीवन-समंकों को सुधारने में बल्कि अब तो सवाल ये है कि इतनी मदद भारत को आज़ादी के बाद से हासिल होना शुरू हो जाती तो भारत आज के भारत से 25 साल आगे होता.  पाकिस्तान के सन्दर्भ में देखें तो आपको समझ आएगा कि उसे मिलने वाली विदेशी धनराशी भारत के खिलाफ आतंक, गुड और बैड आतंकवाद वाले  सैनिक प्रशासन के सिद्धांत के चलते कपूर हो गया होगा. बचा-खुचा धन भ्रष्टाचार के हवन कुंड में अवश्य ही गया होगा .

  पाकिस्तानी रूपए के अवमूल्यन के क्या परिणाम होंगे ..?

सुधि पाठको , बेहद विस्तार से पाकिस्तानी अर्थशास्त्र को आपने पूर्व के पैराग्राफ देख ही लिया होगा , फिर भी बताना ज़रूरी है कि – पाकिस्तानी दुष्प्रबंधन में  अर्थव्यवस्था में तेज़ी से मुद्रा स्फीति एवं मूल्यों की अस्थिरता के चलते घरेलू उत्पादकता घटेगी बावजूद इसके कि कई मामलों में पाकिस्तान के पास सिंध और बलोचस्तान में प्रचुर मात्रा में खनिज संसाधन हैं तथा कृषि उत्पादों के कुछ मामलों में तो पाकिस्तान भारत से अधिक उत्तम है का भी लाभ पूंजी के अभाव में न मिल सकेगा

 

 

क्या भारत से पाकिस्तान युद्ध करेगा ?

इस सवाल का उत्तर ग्लोबलाईजेशन के इस युग में नहीं में है. बल्कि अगर भारत के साथ युद्ध किया भी गया तो “अबकी बार पाक में भारत सरकार” की स्थिति को नकारना भी गलत ही होगा. भारत ने विश्व के समूचे अतिमहत्वपूर्ण देशों के साथ स्नेहिल रिश्ते बना लिए . विश्व के आम नागरिक भारतीय संस्कृति , इसकी डेमोक्रेसी, के प्रशंसक भी हैं . इस बात का इल्म पाकिस्तान सरकार को और उनके सैन्य प्रशासन को है. वे  कभी भी ऐसा नहीं करेंगे . साथ ही युद्ध का विचार कुछ लोगों के मन में अवश्य है परन्तु वे यदि ऐसा करते हैं तो तय है कि युद्धोंमादित उत्साह रुदन में बदलने में कोई विलम्ब न होगा.

मेरे मित्र अक्सर पूछतें हैं कि – चीन ने डोकलाम के बाद भारत से सम्बन्ध सुधार लिए हैं ..?

मेरा उत्तर यही होता है कि – “पाकिस्तान चीन के सामने आया एक भिक्षुक है भारत चीन के बीच व्यावसायिक सम्बन्ध हैं. अब बताएं आप चीन होते मैं भारत होता और रामलाल जी पाकिस्तान होते तो ऐसी स्थिति में आप किसके साथ कॉफ़ी हाउस जाते ?” मित्र मुस्कुराकर कहते कोई भी अध्यात्मिक भिक्षुकों के अलाव दरवाजे पर आए भिखारी के साथ कॉफी तो क्या पानी भी न पिएगा.. हा...हा...हा..!

अदृश्य स्याही एक पहेली : श्रीमन प्रशांत पोल

 प्राचीन भारत में ऋषि-मुनियों को जैसा अदभुत ज्ञान था, उसके बारे में जब हम जानते हैं, पढ़ते हैं तो अचंभित रह जाते हैं. रसायन और रंग विज्ञान ने भले ही आजकल इतनी उन्नति कर ली हो, परन्तु आज से 2000 वर्ष पहले भूर्ज-पत्रों पर लिखे गए "अग्र-भागवत" का यह रहस्य आज भी अनसुलझा ही है.
जानिये इसके बारे में कि आखिर यह "अग्र-भागवत इतना विशिष्ट क्यों है? अदृश्य स्याही से सम्बन्धित क्या है वह पहेली, जो वैज्ञानिक आज भी नहीं सुलझा पाए हैं.

आमगांव… यह महाराष्ट्र के गोंदिया जिले की एक छोटी सी तहसील, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की सीमा से जुडी हुई. इस गांव के ‘रामगोपाल अग्रवाल’, सराफा व्यापारी हैं. घर से ही सोना, चाँदी का व्यापार करते हैं. रामगोपाल जी, ‘बेदिल’ नाम से जाने जाते हैं. एक दिन अचानक उनके मन में आया, ‘असम के दक्षिण में स्थित ‘ब्रम्हकुंड’ में स्नान करने जाना है. अब उनके मन में ‘ब्रम्हकुंड’ ही क्यूँ आया, इसका कोई कारण उनके पास नहीं था. यह ब्रम्हकुंड (ब्रह्मा सरोवर), ‘परशुराम कुंड’ के नाम से भी जाना जाता हैं. असम सीमा पर स्थित यह कुंड, प्रशासनिक दृष्टि से अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में आता हैं. मकर संक्रांति के दिन यहाँ भव्य मेला लगता है.
‘ब्रम्ह्कुंड’ नामक स्थान अग्रवाल समाज के आदि पुरुष/प्रथम पुरुष भगवान अग्रसेन महाराज की ससुराल माना जाता है. भगवान अग्रसेन महाराज की पत्नी, माधवी देवी इस नागलोक की राजकन्या थी. उनका विवाह अग्रसेन महाराज जी के साथ इसी ब्रम्ह्कुंड के तट पर हुआ था, ऐसा बताया जाता है. हो सकता हैं, इसी कारण से रामगोपाल जी अग्रवाल ‘बेदिल’ को इच्छा हुई होगी ब्रम्ह्कुंड दर्शन की..! वे अपने ४–५ मित्र–सहयोगियों के साथ ब्रम्ह्कुंड पहुंच गए. दुसरे दिन कुंड पर स्नान करने जाना निश्चित हुआ. रात को अग्रवाल जी को सपने में दिखा कि, ‘ब्रम्ह्सरोवर के तट पर एक वटवृक्ष हैं, उसकी छाया में एक साधू बैठे हैं. इन्ही साधू के पास, अग्रवाल जी को जो चाहिये वह मिल जायेगा..! दूसरे दिन सुबह-सुबह रामगोपाल जी ब्रम्ह्सरोवर के तट पर गये, तो उनको एक बड़ा सा वटवृक्ष दिखाई दिया और साथ ही दिखाई दिए, लंबी दाढ़ी और जटाओं वाले वो साधू महाराज भी. रामगोपाल जी ने उन्हें प्रणाम किया तो साधू महाराज जी ने अच्छे से कपडे में लिपटी हुई एक चीज उन्हें दी और कहा, “जाओं, इसे ले जाओं, कल्याण होगा तुम्हारा.” वह दिन था, ९ अगस्त, १९९१.
आप सोच रहे होंगे कि ये कौन सी "कहानी" और चमत्कारों वाली बात सुनाई जा रही है, लेकिन दो मिनट और आगे पढ़िए तो सही... असल में दिखने में बहुत बड़ी, पर वजन में हलकी वह पोटली जैसी वस्तु लेकर, रामगोपाल जी अपने स्थान पर आए, जहां वे रुके थे. उन्होंने वो पोटली खोलकर देखी, तो अंदर साफ़–सुथरे ‘भूर्जपत्र’ अच्छे सलीके से बांधकर रखे थे. इन पर कुछ भी नहीं लिखा था. एकदम कोरे..! इन लंबे-लंबे पत्तों को भूर्जपत्र कहते हैं, इसकी रामगोपाल जी को जानकारी भी नहीं थी. अब इसका क्या करे..? उनको कुछ समझ नहीं आ रहा था. लेकिन साधू महाराज का प्रसाद मानकर वह उसे अपने गांव, आमगांव, लेकर आये. लगभग ३० ग्राम वजन की उस पोटली में ४३१ खाली (कोरे) भूर्जपत्र थे. बालाघाट के पास ‘गुलालपुरा’ गांव में रामगोपाल जी के गुरु रहते थे. रामगोपाल जी ने अपने गुरु को वह पोटली दिखायी और पूछा, “अब मैं इसका क्या करू..?” गुरु ने जवाब दिया, “तुम्हे ये पोटली और उसके अंदर के ये भूर्जपत्र काम के नहीं लगते हों, तो उन्हें पानी में विसर्जित कर दो.” अब रामगोपाल जी पेशोपेश में पड गए. रख भी नहीं सकते और फेंक भी नहीं सकते..! उन्होंने उन भुर्जपत्रों को अपने पूजाघर में रख दिया.
कुछ दिन बीत गए. एक दिन पूजा करते समय सबसे ऊपर रखे भूर्जपत्र पर पानी के कुछ छींटे गिरे, और क्या आश्चर्य..! जहां पर पानी गिरा था, वहां पर कुछ अक्षर उभरकर आये. रामगोपाल जी ने उत्सुकतावश एक भूर्जपत्र पूरा पानी में डुबोकर कुछ देर तक रखा और वह आश्चर्य से देखते ही रह गये..! उस भूर्जपत्र पर लिखा हुआ साफ़ दिखने लगा. अष्टगंध जैसे केसरिया रंग में, स्वच्छ अक्षरों से कुछ लिखा था. कुछ समय बाद जैसे ही पानी सूख गया, अक्षर भी गायब हो गए. अब रामगोपाल जी ने सभी ४३१ भुर्जपत्रों को पानी में भिगोकर, सुखने से पहले उन पर दिख रहे अक्षरों को लिखने का प्रयास किया. यह लेखन देवनागरी लिपि में और संस्कृत भाषा में लिखा था. यह काम कुछ वर्षों तक चला. जब इस साहित्य को संस्कृत के विशेषज्ञों को दिखाया गया, तब समझ में आया, की भूर्जपत्र पर अदृश्य स्याही से लिखा हुआ यह ग्रंथ, अग्रसेन महाराज जी का ‘अग्र भागवत’ नाम का चरित्र हैं. लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व जैमिनी ऋषि ने ‘जयभारत’ नाम का एक बड़ा ग्रंथ लिखा था. उसका एक हिस्सा था, यह ‘अग्र भागवत’ ग्रंथ. पांडव वंश में परीक्षित राजा का बेटा था, जनमेजय. इस जनमेजय को लोक साधना, धर्म आदि विषयों में जानकारी देने हेतू जैमिनी ऋषि ने इस ग्रंथ का लेखन किया था, ऐसा माना जाता हैं.
रामगोपाल जी को मिले हुए इस ‘अग्र भागवत’ ग्रंथ की अग्रवाल समाज में बहुत चर्चा हुई. इस ग्रंथ का अच्छा स्वागत हुआ. ग्रंथ के भूर्जपत्र अनेकों बार पानी में डुबोकर उस पर लिखे गए श्लोक, लोगों को दिखाए गए. इस ग्रंथ की जानकारी इतनी फैली की इंग्लैंड के प्रख्यात उद्योगपति लक्ष्मी मित्तल जी ने कुछ करोड़ रुपयों में यह ग्रंथ खरीदने की बात की. यह सुनकर / देखकर अग्रवाल समाज के कुछ लोग साथ आये और उन्होंने नागपुर के जाने माने संस्कृत पंडित रामभाऊ पुजारी जी के सहयोग से एक ट्रस्ट स्थापित किया. इससे ग्रंथ की सुरक्षा तो हो गयी. आज यह ग्रंथ, नागपुर में ‘अग्रविश्व ट्रस्ट’ में सुरक्षित रखा गया हैं. लगभग १८ भारतीय भाषाओं में इसका अनुवाद भी प्रकाशित हुआ हैं. रामभाऊ पुजारी जी की सलाह से जब उन भुर्जपत्रों की ‘कार्बन डेटिंग’ की गयी, तो वह भूर्जपत्र लगभग दो हजार वर्ष पुराने निकले.
यदि हम इसे काल्पनिक कहानी मानें, बेदिल जी को आया स्वप्न, वो साधू महाराज, यह सब ‘श्रध्दा’ के विषय अगर ना भी मानें... तो भी कुछ प्रश्न तो मन को कुरेदते ही हैं. जैसे, कि हजारों वर्ष पूर्व भुर्जपत्रों पर अदृश्य स्याही से लिखने की तकनीक किसकी थी..? इसका उपयोग कैसे किया जाता था..? कहां उपयोग होता था, इस तकनीक का..? भारत में लिखित साहित्य की परंपरा अति प्राचीन हैं. ताम्रपत्र, चर्मपत्र, ताडपत्र, भूर्जपत्र... आदि लेखन में उपयोगी साधन थे.

मराठी विश्वकोष में भूर्जपत्र की जानकारी दी गयी हैं, जो इस प्रकार है – “भूर्जपत्र यह ‘भूर्ज’ नाम के पेड़ की छाल से बनाया जाता था. यह वुक्ष ‘बेट्युला’ प्रजाति के हैं और हिमालय में, विशेषतः काश्मीर के हिमालय में, पाए जाते हैं. इस वृक्ष के छाल का गुदा निकालकर, उसे सुखाकर, फिर उसे तेल लगा कर उसे चिकना बनाया जाता था. उसके लंबे रोल बनाकर, उनको समान आकार का बनाया जाता था. उस पर विशेष स्याही से लिखा जाता था. फिर उसको छेद कर के, एक मजबूत धागे से बांधकर, उसकी पुस्तक / ग्रंथ बनाया जाता था. यह भूर्जपत्र, उनकी गुणवत्ता के आधार पर दो – ढाई हजार वर्षों तक अच्छे रहते थे. भूर्जपत्र पर लिखने के लिये प्राचीन काल से स्याही का उपयोग किया जाता था. भारत में, ईसा के पूर्व, लगभग ढाई हजार वर्षों से स्याही का प्रयोग किया जाता था, इसके अनेक प्रमाण मिले हैं. लेकिन यह कब से प्रयोग में आयी, यह अज्ञात ही हैं. भारत पर हुए अनेक आक्रमणों के चलते यहाँ का ज्ञान बड़े पैमाने पर नष्ट हुआ है. परन्तु स्याही तैयार करने के प्राचीन तरीके थे, कुछ पध्दतियां थी, जिनकी जानकारी मिली हैं. आम तौर पर ‘काली स्याही’ का ही प्रयोग सब दूर होता था. चीन में मिले प्रमाण भी ‘काली स्याही’ की ओर ही इंगित करते हैं. केवल कुछ ग्रंथों में गेरू से बनायी गयी केसरियां रंग की स्याही का उल्लेख आता हैं.
मराठी विश्वकोष में स्याही की जानकारी देते हुए लिखा हैं – ‘भारत में दो प्रकार के स्याही का उपयोग किया जाता था. कच्चे स्याही से व्यापार का आय-व्यय, हिसाब लिखा जाता था तो पक्की स्याही से ग्रंथ लिखे जाते थे. पीपल के पेड़ से निकाले हुए गोंद को पीसकर, उबालकर रखा जाता था. फिर तिल के तेल का काजल तैयार कर उस काजल को कपडे में लपेटकर, इस गोंद के पानी में उस कपडे को बहुत देर तक घुमाते थे. और वह गोंद, स्याही बन जाता था, काले रंग की..’ भूर्जपत्र पर लिखने वाली स्याही अलग प्रकार की रहती थी. बादाम के छिलके और जलाये हुए चावल को इकठ्ठा कर के गोमूत्र में उबालते थे. काले स्याही से लिखा हुआ, सबसे पुराना उपलब्ध साहित्य तीसरे शताब्दी का है. आश्चर्य इस बात का हैं, की जो भी स्याही बनाने की विधि उपलब्ध हैं, उन सब से पानी में घुलने वाली स्याही बनती हैं. जब की इस ‘अग्र भागवत’ की स्याही, भूर्जपत्र पर पानी डालने से दिखती हैं. पानी से मिटती नहीं. उलटें, पानी सूखने पर स्याही भी अदृश्य हो जाती हैं. इस का अर्थ यह हुआ, की कम से कम दो – ढाई हजार वर्ष पूर्व हमारे देश में अदृश्य स्याही से लिखने का तंत्र विकसित था. यह तंत्र विकसित करते समय अनेक अनुसंधान हुए होंगे. अनेक प्रकार के रसायनों का इसमें उपयोग किया गया होगा. इसके लिए अनेक प्रकार के परीक्षण करने पड़े होंगे. लेकिन दुर्भाग्य से इसकी कोई भी जानकारी आज उपलब्ध नहीं हैं. उपलब्ध हैं, तो अदृश्य स्याही से लिखा हुआ ‘अग्र भागवत’ यह ग्रंथ. लिखावट के उन्नत आविष्कार का जीता जागता प्रमाण..!
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि ‘विज्ञान, या यूं कहे, "आजकल का शास्त्रशुध्द विज्ञान, पाश्चिमात्य देशों में ही निर्माण हुआ" इस मिथक को मानने वालों के लिए, ‘अग्र भागवत’ यह अत्यंत आश्चर्य का विषय है. स्वाभाविक है कि किसी प्राचीन समय इस देश में अत्यधिक प्रगत लेखन शास्त्र विकसित था, और अपने पास के विशाल ज्ञान भंडार को, पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करने की क्षमता इस लेखन शास्त्र में थी, यह अब सिध्द हो चुका है..! दुर्भाग्य यह है कि अब यह ज्ञान लुप्त हो चुका है. यदि भारत में समुचित शोध किया जाए एवं पश्चिमी तथा चीन की लाईब्रेरियों की ख़ाक छानी जाए, तो निश्चित ही कुछ न कुछ ऐसा मिल सकता है जिससे ऐसे कई रहस्यों से पर्दा उठ सके.