पाकिस्तानी सैनिक विद्रोह कर सकतें हैं ?

पाकिस्तानी आंतरिक व्यवस्था इतनी जर्जर गोया कभी न रही होगी जितनी वर्तमान में नज़र आ रहीं है । क्या बिना मज़बूत आर्थिक ढांचे के पाकिस्तानी रक्षा व्यवस्था स्थायित्व रह सकती है ? तो मेरे मतानुसार इसका उत्तर न में सबसे सरल है । 
इन दिनों पाकिस्तान की माली हालात भी बेहद नाजुक हैं । एक ऐसे बड़ी हवेली की तरह है जो शानो शौकत को बनाए रखने लायक आमद भी हासिल कर पाने में कमज़ोर साबित हो रही है । आखिर नवाबी थ्योरी पर बने पाकिस्तान के लोग क्या विकास के मायने नहीं जानते । बेशक नहीं जानतें क्योंकि पाकी हुकूमतों के ज़रिये उनको मिलीं जन्मजात अमेरिकी सहूलियतों ने अपाहिज़ बना दिया । उस पर पाकिस्तानी दिफ़ाई-डेमोक्रेसी (आर्मी डोमिनेटेड डेमोक्रेसी ) में डेवलपमेन्ट यानी सामाजिक विकास के मुददे सेकंडरी हो गए । जबकि भारतीय उपमहाद्वीप के अन्य देशों की तरह पाकिस्तान में बौध्दिक संपदा के विकास के समुचित अवसर मौज़ूद थे और हैं भी । इसनें जेनेटिक प्रभाव को अनदेखा नहीं किया जा सकता ।

 एक सियासी ज़िद की वजह से
सैनिकों के झुके सिर 1971


फिर क्या हुआ कि एक मुल्क अपनी आज़ादी को अब सम्हाल पाने में असहाय नज़र आ रहा है ?
इस सवाल की पड़ताल करें तो पता चलता है कि - पाकिस्तानी हुकूमतों ने हमसाया मुल्कों के साथ व्यक्तिगत द्वेषपूर्ण व्यवहार का न केवल इज़हार किया वरन दुश्मनी का बर्ताव भी किया । पाकिस्तानी हुकूमतों के पास अगर एजुकेशन और एके47 देने के विकल्पों में चुनने को कहा जाय तो तय मानिये वे कश्मीरियों और अन्य लोगों को एके47 देना अधिक मुनासिब समझेंगे । जबकि भारत में भले ही धीरे धीरे पर एजूकेशन पर खासा ध्यान दिया । क्योंकि भारत डेमोक्रेटिक रूप से आर्मी पर आधारित न था न ही होगा बल्कि भारत आर्मी को एक सम्मानित ईकाई के रूप में विकसित कर चुका है , यही नीतिकारों का संकल्प भी था । 
भारतीय सैनिकों ने 1960 से जितने भी ज़ुल्म सहे उनमें भारतीय सेना ने क़दम से क़दम मिला कर भारतीय संकल्पना को आकार दिया । युद्ध में सामान्य से बूट पहने पुरानी राइफलों से काम चलाया और आज सेना विश्व की सबसे ताकतवर सेनाओं में शुमार है । 
इतना ही नहीं भारतीय वैज्ञानिकों विचारकों कानूनविदों सियासी थिंकर्स और तो और आम आदमी ने भी भारत की अस्मिता की रक्षा के लिए खुद को तैयार रखा , किसान भी पीछे न रहे अमेरिकन लाल गेंहूँ खाने वाला भारत अब कृषि उत्पादन में आगे ही आगे बढ़ रहा है । 
अपवादों को छोड़ दिया जाए तो औसतन भारत अपनी जनशक्ति के बूते फिर शक्तिशाली नज़र आ रहा है । 
उधर पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों और नेताओं पर खुले आम भ्रष्टाचारी होने के मामले बहसों के ज़रिए सामने आ रहे हैं यानी उस देश का धन या तो उनके ही शब्दों में गुड आतंक के हवाले हुआ अथवा भ्रष्टाचार के ज़रिए वहां के रसूखदारों के गुप्तख़ज़ानों में आइंदा नस्लों के लिए महफूज़ रखा गया है । 
जब इस बात का खुलासा होने लगा तो पाकिस्तानी आम आदमी बगावत अवश्य करेगा जिसका सबसे बड़ा असर वहां की फोर्स पर पड़ना स्वभाविक है, पाक फ़ौज के सैनिक विद्रोही हो जाएं इस बात से इंकार करना भी गलत है । 
मुझे तो इस बात का पूरा पूरा अंदेशा है कि - पाक आर्मी की तुलना में पाकिस्तानी फौज और सिविल सरकार धर्म के नाम पर आतंकवादियों के ज़रिए मिशन अशांति को पूरा कर रहें हैं, अर्थात फ़ौज ने आउट सोर्सिंग का सहारा ले लिया है । 
चीन को इस बात का इल्म यकीनी तौर पर हो चुका है कि पाकिस्तान को दिया कर्ज़ वसूलने में उसे कितनी तकलीफ़ होगी सो चीनी सरकार की पाकिस्तान-नीतियों में शनै: शनै: बदलाव स्वाभाविक रूप से आएगा । 
भारतीय टीम भी इस अवसर को अवश्य भुनाएगी और भुनाने में कोई बुराई नहीं है । क्योंकि पाकिस्तानी सियासी सोच उसके विखंडन तक बदलेगी ऐसा कुछ दूर दूर तक नज़र नहीं आ रहा । 
वैसे भारत समताधारित द्विराष्ट्रीय रिश्ते का हिमायती है परंतु पाकिस्तान नहीं । कारण वहां के सैन्य और सिविल प्रशासन-प्रवंधन में इन बातों के लिए कोई स्थान नहीं । अगर पाकिस्तान को अपना नक्शा बचाए रखना है तो उसे विश्व व्यापारिक सम्बन्धों पर आधारित वैश्विक नीति अपनानी होगी । अब न तो धर्ममान्धता पर आधारित नीति कारगर रह सकती है और न ही अन्य किसी देश को कमज़ोर करने वाली नीति । अगर ऐसा होता तो अमेंरिका सहित विश्व के कई विकसित देशों में भारतीय ब्रेन उनके विकास के लिए काम न कर रहे होते ।
पाकिस्तान की एक सबसे बड़ी कमजोरी यह भी है कि वहां की फ़ौज और सिविल सरकार के बीच अजीब सा रिश्ता कायम है । जिसे विकास करना है वो सिविल सरकार  पंगु है फ़ौज के आगे फ़ौज एक विशेष कार्य के संपादन के लिए सक्षम होतीं हैं न कि हर किसी विषय के लिए । आर्थिक सामाजिक न्यायिक कृषि क्षेत्र सहित विकास के सारे क्षेत्र के निर्णय  केवल सामरिक एवम रक्षा का दायित्व सम्हालने वाली ईकाई द्वारा रेग्यूलेट होना अपने आप में अवैज्ञानिक अव्यवहारिक है ।
  पाकिस्तानी आवाम को सम्पूर्ण क्रांति के ज़रिये बदलाव लाने के लिये वहाँ की परिस्थितियाँ अनुकूल कदापि नहीं । वहां सिंध बलूचिस्तान अफ़ग़ान जैसे विषय के साथ साथ पीओके कश्मीरी मुद्दा आंतरिक विघटन के खुले उदाहरण हैं ।
फिर अनुत्पादकता अशिक्षा कमज़ोर वाइटल समंक , अनुत्पादक आबादी, फिरका-परस्ती, जैसी परिस्थितियों से उस देश की जर्जर स्थिति है । जबकि हमारे साथ सामान्य रिश्ते पाकिस्तान के लिए एक सहज एवम सरल रास्ता था । परंतु कुंठित मानसिकता से पाकिस्तान जहां था उससे भी पीछे नज़र आ रहा है ।
चलिए देखतें हैं आत्मसमर्पण करने वाली सेना कहीं विद्रोह न कर दे वरना बलूचिस्तान पीओके सिंध अलग होने में देर न होगी