सरित-प्रवाह और समय प्रवाह

सुधि पाठक

            सुप्रभात एवं शारदेय नवरात्री के पूजा-पर्व पर पर आपकी आध्यात्मिक उन्नति की कामना के आह्वान के साथ अपनी बात रखना चाहता हूँ .  

           नदियों के किनारे विकसित सभ्यता का अर्थ समृद्ध जीवन ही है . आज प्रात: काल से मैं अपनी नई ज़िंदगी की शुरुआत करने जा रहा हूँ. ज़िंदगी अपनी 54 वर्ष के बाद बदलेगी मुझे यकीन नहीं हो रहा . हमारा नज़रिया होता है कि नदी अपने साथ समय की तरह बहाकर बहुत कुछ ले जाती है परन्तु हम बहुत देर समझ सोच पाते हैं कि नदियाँ अपने साथ बहुत कुछ लेकर भी आतीं हैं . और अपने किनारों को बांटतीं हुईं  निकल भी जातीं हैं . ठीक वैसे तरह  सरिता के प्रवाह सा समय भी बहुत कुछ लेकर आता और लेकर  जाता है. इस लेकर आने और लेकर जाने के व्यवसाय में नहीं से अधिक लाभ स्थानीय रूप से होता है.

     हम सभी समय-सरिता के इस पार या उस पार रहा करतें हैं . जहां हम आत्म चिंतन के ज़रिये इस प्रवाह के साथ कुछ न कुछ  चाहते न चाहते बह जाने देतें हैं. कुछ नया जो बहकर आता है उसे आत्मसात कर लेतें हैं. 29 नवम्बर 1962 को मेरा जन्म हुआ था. जीवन का हिसाब किताब जन्म से ही रखना चाहिए  सो रख रहा हूँ.

     54 वर्ष की आयु में आकर पता चला कि अभी तक जो हासिल हुआ या कहूं हासिल किया उसे शून्य ही मानता हूँ. क्योंकि हमेशा सोचता रहा नदी की तरह समय ने भी मुझमें से बहुत कुछ बहा लिया है. सोच ठीक थी पर जो समय-सरिता  में बहा उसका शोक मनाते मनाते जो समय-सरिता ने दिया उसे संजो न पा सका . करते कराते उम्र की आधी सदी बीत गई.

    जो कुछ भी बहा के लेगी समय सरिता वो मेरा न था और अब जो पास में है या जो प्रवाह से मुझे मिला तथा मेरे पास सुरक्षित है वो मेरा है इस बात को समझने के लिए 54 साल लगना एक अलहदा बात है. इस पर कभी और बात होगी. आज शारदेय नवरात्री के पूजा पर्व शुरू हो चुकें हैं . इन 9 दिनों में कुछ चमत्कार अवश्य होगा. क्योंकि अब मेरा नज़रिया बदल गया है.

   21 सितम्बर 2017 ,अभी बस इतना ही शेष फिर .......... क्रमश:            

मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर कर दे ..!!

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  किश्तें कुतरतीं हैं हमारी जेबें लेकिन कभी भी हम ये सोच नहीं पाते कि काश कि हमारे पांव के बराबर हमारी चादर हो जाये जगजीत सिंह की एक ग़ज़ल जिसका ये शेर सबकी अपनी कहानी है.... 

और कुछ भी मुझे दरकार नहीं है लेकिन
मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर कर दे ..!!

  पर क्या लुभावने इश्तहारों पर आश्रित बेतहाशा दिखा्वों के पीछे भागती दौड़ती हमारी ज़िंदगियां खुदा से इतनी सी दरकार कर पातीं हैं........ न शायद इससे उलट. जब भी खु़दा हमारी चादर हमारे पैरों के बराबर करता है फ़ौरन हमारा क़द बढ़ जाता है. यानी कि बस हम ये सिद्ध करने के गुंताड़े में लगे रहते हैं कि हम किसी से कमतर नहीं .

    बया बा-मशक्कत जब अपना घौंसला पूरा कर लेती है तो सुक़ून से निहारती है.. मुझे याद है उनकी हलचल घर के पीछे जब वो खुश होकर चहचहाती थी.  तेज़ हवाएं  भी उसके घौंसले को ज़ुदा न कर पाते थे आधार से... ! 

वो सुक़ून तलाशता हूं घर बनाने वालों में........ दिखाई नहीं देता. अपने चेहरों पर अपने मक़ान को घर बनाने वाला भाव आना चाहिये जो बया के चेहरे पर नज़र आता है हां वो भाव  जो दिखता नहीं हमारे चेहरों पर जो भी कुछ है सब आर्टिफ़ीशियल .. जैसे बलात कोई मुस्कुराहट हमारे लबों पे चस्पा किये जाता हो.. या मुस्कुराहटें हमारी मज़बूरियां हों. 

    तिनका तिनका तलाशती बया खूबसूरत घर बनाती तब से मुझे (आपको भी) लुभाती होगी  किया कभी आपने. पर एक नातेदार के घर पर बुलाया हमको गृह-प्रवेश जो था.. चेहरे पर उनके  बया वाले भाव की तलाश अचानक तब थमी जब गृह स्वामी ने कहा -"बीस बरस चलेंगी किश्तें.."
यानी बीस बरस तक वो आभासी मालिक-ए-मक़ान होगा.. किश्तों के साथ हौले हौले स्वामित्व का  एहसास पैकर (मूर्त होगा) होगा. तब तक एक तनाव होगा उसके मानस पर जो देगा बीमारियां.. शुगर.. हार्ट.. हां कभी कभार  हंसेगा ज़रूर भवन स्वामी परंतु  कृत्रिम तौर पर.

कर्ज़ के मक़ान, कर्ज़ का सामान, कर्ज़ की ज़िंदगी   जो किश्तों में मुस्कुराती है..आज़ाद भारत के हम भारतीय अमेरिकियों की मानिंद खोखले धनवान होने की क़गार पर हैं..!
क्रेडिट के विस्तार ने अमेरिका को ज़मीन दिखा दी लेकिन हमारे देश में आने वाले दस वर्षों में क्रेडिट का यह  भयावह खेल पाताल दिखाएगा. काश हम इस लापरवाह अर्थ व्यवस्था और अपनी बेलगाम लालच पर लग़ाम न कस सके तो तय है कि कल बहुत भयावह होगा....................