• प्रेम काव्य - 01

    प्रिया,सहज ही तुमने क्योंकर
    भेजा मुझ तक प्रीत निमंत्रण ..!
    *********************
    मैं विरही हूँ तुम प्रतिबंधित
    हर आहट पे हुए सशंकित
    चिंता भरे हरेक पल मेरे
    मन बिसरा करना अब चिंतन !
    हूक उभरती तुम्हें याद कर
    बिना मिलन हर जीत विसर्जन !
    प्रिया,सहज ही तुमने क्योंकर
    भेजा मुझ तक प्रीत निमंत्रण ..!
    *********************
    तुम्हें खोजतीं आंखें मेरी
    टकटक शशि की ओर निहारें !
    तुम उस पथ से आतीं होगी ,
    सोच के अँखियाँ पंथ-बुहारें !
    तुम संयम की सुदृढ़ बानगी
    मैं संयम से सदा अकिंचन !
    प्रिया,सहज ही तुमने क्योंकर
    भेजा मुझ तक प्रीत निमंत्रण ..!

  • प्रेम काव्य - 02

    रख देता हूँ रहन
    अपने चंचल सपन
    तुम्हारे चंचल मन के पास
    और फिर सोने की कवायद में
    करवटें बदलता हूँ
    देर रात तलक
    न दिमाग सोता है
    न कलम
    दिलो दिमाग पर
    विषय ऊगते हैं ...
    कुछ पूछते हैं
    कुछेक जूझते हैं मुझसे
    लिखता हूँ
    मुक्कमल हो जाता हूँ..
    फिर झपकतीं हैं पलकें
    तुम वापस भेज देतीं हो
    नींद जो रख देता हूँ रोज़ रहन
    तुम्हारे पास
    फिर होती है
    भोर तो मेरी रोजिन्ना
    देर से होती है !
    तब जब पेप्पोर रद्दी वाला चीखता है
    हाँ तभी
    जब भोर हो जाती है

  • प्रेम काव्य - 03

    मादक हो तुम मदिरालय फिर क्यों जाना
    क्यों कर मद क्रय कर फिर घर लाना ..!!

    जब मानस में मधु-निशा आभासित हो-
    तो फिर क्यों कोई मदिरालय परिभाषित हो
    विकल कभी अरु कभी तुम्हारा मुस्काना !
    मादक हो तुम.....................!!

    तुम संग मिलन कामना अर्चन से दोगुन
    विरह तपस्या से भी होता है प्रिय चौगुन
    प्रेम स्वर्ण का ज्यों तप के गल जाना !!
    मादक हो तुम.....................!!
    लौहित अधर धर अधर धराधर मद धारा -
    ज्यों पूनम निशि उभरे सागर का धारा !
    यूं उर -ओज की दमक मुख पर आना !!
    मादक हो तुम.....................!!

  • राहत इन्दौरी जी को मेरा ज़वाब

    राहत_इन्दौरी साहेब की ग़ज़ल
    अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो
    अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है
    ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है
    लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में
    यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है
    मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन
    हमारी तरहा हथेली पे जान थोड़ी है
    हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है
    हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है
    जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
    किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है
    सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
    किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है

    राहत_इन्दौरी
    अब प्रस्तुत है मेरी गजल ... उर्दू लिटरेचर के मापदंडों में उन्नीस-बीस हो सकती है पर सकारात्मक सृजन राष्ट्रीय चिंतन के बिंदु पर मुक्कमल मानता हूँ.. यकीनन आप भी मानेंगे.

    जो खिलाफ हैं वो समझदार इंसान थोड़ी हैं
    जो वतन के साथ हैं वो बेईमान थोड़ी है ।।

    लगेगी आग तो बुझाएंगे हम सब मिलकर
    बस्ती हमारी है वफादार हैं बेईमान थोड़ी हैं ।।

    मैं जानता कि हूँ वो दुश्मन नहीं था कभी मेरा
    उकसाने वालों का सा मेरा खानदान थोड़ी है ।।

    मेरे मुंह से जो भी निकले वही सचाई है
    मेरे मुंह में पाकिस्तानी ज़ुबान थोड़ी है ।।

    वो साहिबे मसनद है कल रहे न रहे -
    वो भी मालिक है ये किराए की दूकान थोड़ी है

    अब तो हर खून को बेशक परखना होगा
    वतन हमारे बाप का है हर्फ़ों की दुकान थोड़ी है ।।
    #गिरीश_बिल्लोरे_मुकुल

  • हाकिम से कुछ हुआ न, हुआ हुक्मरान से

    हाकिम से कुछ हुआ न, हुआ हुक्मरान से
    दंगे रुके हैं शहर के, मेरी – ज़ुबान से !!
    शायर हूँ इबादत, मेरी- “अमनो-अमन है” यार
    तुम रख लो अपने फलसफे उजड़ी दुकान के !!
    उजड़े हुए घरौंदे, ये छींटाकशी के दौर –
    पहुंचेंगी ये दुनियाँ कहो किस मुकाम पे ?
    गिरीश बिल्लोरे “मुकुल”

बूंद से नदी बन जाने की उमंग और उत्कंठा ..!

बेशक बूंदें ही रहीं होंगी
जिनने एकसाथ
सोचा होगा-“चलो मैली चट्टानों को
रेतीली मटमैली ढलानों को
धो आते हैं..!!
ऊसर बंजर को हरियाते हैं !!
मर न जाएं प्यासे बेज़ुबान

चलो उनकी प्यास बुझा आतें हैं…!!”
कुछेक बोली होंगी- “हम सब मिलकर धार बनेंगी..
सारी नदियों से विलग हम उल्टी बहेंगी

उल्टे बहाव का कष्ट सहेंगी..?
न हम तो…!

तभी उनको कुछ ने डपटा होगा
एक जुट बूंदों ने बहना
शुरु किया होगा तब

हां तब
जब न हम थे न हमारी आदम जात
तब शायद कुछ भी न था
पर एक सोच थी
बूंदों में
एक जुट हो जाने की
बूंद से नदी बन जाने की उमंग और उत्कंठा ..!
लो ये वही नदियां हैं
जिनको कहते हैं हम नर्मदा या गंगा !!
नदियां जो धुआंधार हैं-
काले मटमैले पहाड़ों को धोती
तुमसे भी कुछ कह रहीं हैं
एकजुट रहो तभी तो चट्टानों के घमंड
तोड़ पाओगे ….वरना ऐसे ही बूंद-बूंद ही जाओगे..!!

खौफ़ खाके जो तुम निकले, उसी दहशत में हम निकले .

 

गिरह खोली गिने हमने, हमारे गम भी कम निकले

नमी क्यों आपकी आँखों में मेरे गम,  तो सनम निकले .

 

रोज़ बातें अंधेरों की,  फसानों के बड़े किस्से -

खौफ़ खाके जो तुम निकले, उसी दहशत में हम निकले .

 

किसी शफ्फाक गुंचे पे, यकीं बेहद नहीं करना –

सिपाही कह रहे थे – “गुंचों में कई बार बम निकले ..!!”

 

लूट लाए थे मुफलिस, दुकानें आज कपड़ों की   –

बाँट पाए न आपस में, सभी के सब कफ़न निकले !!

ख्वाहिशें पाल मत यारां , कोई  ग़ालिब नहीं है तू –
हज़ारों ख्वाहिशें हों और,  हर ख्वाहिश पे दम निकले ?

*गिरीश बिल्लोरे “मुकुल”*

 

मेरी कविताएँ

तेरी छत पे उड़ने की मनाही - तो क्या

मेरी परवाज़ को पूरा आसमान बाक़ी है .

ये मयकदा है झूठी गवाही मत देना -
सबको मालूम है,  यहां ही ईमान बाकी है .

खतीबे-शहर ने ऐसा  क्या  कहा होगा ..?

बाज़ार ख़ाक है कफन की दूकान बाक़ी है !

कविता :- शरद बिल्लोरे के नाम

वो था तो न था 
नहीं है तो तैर कर 
आ जाता है मेरी आँखों में 
टप्प से टपक जाता है 
आँसुओं के साथ 
फिर वाष्पित होकर विराट में 

गुम हो जाता है
आता ज़रूर है 
गाहे बगाहे 
भाई था न  बड़ा था 
आएगा क्यों नहीं 
सुनो तुम सब रोना ज़रूर रोना
ये एक कायिक सत्य है 
सबको उसे याद रखना है 
इन यादों में -
इक हूक सी उठती है आंखे डबडबातीं हैं 
भर जातीं हैं अश्कों से इन्हीं में घुला होता है वो
टपकने मत देना ... 
वो अश्रुओं के साथ हवा में 
खो जाएगा  .... !!

                         गिरीश बिल्लोरे मुकुल 


चित्र : राजा रवि वर्मा 


मादक हो तुम मदिरालय फिर क्यों जाना 
क्यों कर मद क्रय कर फिर घर लाना ..!!

जब मानस में मधु-निशा आभासित हो-
तो फिर क्यों कोई मदिरालय परिभाषित हो 
विकल कभी अरु कभी तुम्हारा मुस्काना !
              मादक हो तुम.....................!!

तुम संग मिलन कामना अर्चन से दोगुन 
विरह तपस्या से भी होता है प्रिय चौगुन 
प्रेम स्वर्ण का ज्यों तप के गल जाना !!
              मादक हो तुम.....................!!
लौहित अधर धर अधर धराधर मद धारा -
ज्यों पूनम निशि उभरे सागर का धारा !
यूं उर -ओज की दमक मुख पर आना !!
              मादक हो तुम.....................!!    


प्रेम रस पगी कविताएँ देखिये "इश्क़ प्रीत लव" पर 


 

दबा हुआ सच अक्सर साथी, सर पे जा बेबाक़ बोलता !!

एक अकेला कँवल ताल में,  संबंधों की रास खोजता !
 रोज़ त्राण फैलाके अपने
 ,तिनके-तिनके पास रोकता !!

 
बहता दरिया  चुहलबाज़ है,
 तिनका तिनका छीन कँवल से ,
दौड़ लगा देता है अक्सर,   पागल सा फिर त्राण  मसल के ! 
है सबका सरोज प्रिय किन्तु  ,
 उसे दर्द क्या.? कौन सोचता !!

     एक अकेला कँवल ताल में,  संबंधों की रास खोजता !

 

रात कुमुदनी जागेगी तब,  मैं विश्रामागार रहूँगा

भ्रमर दंश सहे कितने, उसको कैसे कहो, कहूंगा ?

कैसे पीढा व्यक्त करूंगा – अभिव्यक्ति की राह खोजता !!

              जाग भोर की प्रथम किरन से, अंतिम तक मैं संत्रास भोगता !

  

          पीढ़ा कारक हैं विषपाई, विषम बात मत फैलाओ

          पीतल मूरत को साथी , कनक आप मत कह जाओ !

          सच कहना तो खुल के बोलो, देखें कौन है आज रोकता ?  

              दबा हुआ सच अक्सर साथी, सर पे जा बेबाक़ बोलता !!

             एक अकेला कँवल ताल में,  संबंधों की रास खोजता !

 

कौन होगा अब निराला ?

निराला जी की पुण्यतिथि पर विनम्र शब्द श्रद्धांजली 

 
💐💐💐💐💐💐
 
 
सभी अपने खंड में हैं !
कुछेक तो पाखंड में हैं !!
सभी की अपनी है हाला 
सभी का अपना है प्याला !
कौन होगा अब निराला ?
 
एक अक्खड़ सादगी थे ।
विषमता के पारखी थे ।।
निगलते तो निगल लो -
कष्ट का सूखा निवाला ।।
कौन होगा अब निराला ?
 
वो गुलाबी झड़प उनकी
याद है न तड़प उनकी ?
शब्द के हथियार लेकर 
मोरचा कैसे सम्हाला !!
कौन होगा अब निराला ?
*गिरीश बिल्लोरे मुकुल*